कुछ रिश्ते थे अज़ीज़ साथ,
वो अज़ीज़ भी अब साथ नहीं।
अकेला था शायद रहूं भी मैं,
देखा ख़ुदको आजमाकर मैंने,
पर रिश्तों की डोर हमसे संभलती नहीं।
तो अब बस हुआ ख़ुदको थाम लेता हूं,
छोड़कर इस जहां की माया,
खुद को जरा सा ख़ोज लेता हूं।
वरना जो भी मिला गम ही लाया,
उम्मीद पर खरा कोई उतरा ही नहीं।
अब ये जो रास्ता है बस उसी से बासता हैं,
बेशक ये मुड़ती है मोड़ पर जरूर,
पर अचानक यें साथ छोड़ती तो नहीं।
और निकला हूं घर से मैं,
पर मंजिल का ठिकाना नहीं,
भटक रहा हूं मुसाफिर की तरह,
सफर में कोई हमसफ़र नहीं।
अब जो भी हैं बस सफ़र ही हैं,
मंजिल की चाहत अब बचीं ही नहीं।
मंजिल की चाहत अब बचीं ही नहीं।
Friday, 15 October 2021
सफर, मैं और तुम (सफरनामा)
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