Friday, 21 February 2025

एक वादा

 एक शाम जो भी थी उनके साथ,

हम उनको अपना मान बैठे।

वो मिलते रहे हजारों से,

और हम उनसे, उनके होने का वादा कर बैठे।

वक्त बीता, बीते साल,

बदलता रहा मेरा हाल,

हाल बुरा देखा तो, वो हाथ छुड़ा बैठे।

चले गए वह दूर बहुत,

और हम ता-उम्र के मुंतज़िर बन बैठे।


एक वादा जो खुद से किया था कभी,

उस वादे से खुद को तबाह कर बैठे।

अब तबाही का मंजर देख,

जमाना है हंसता और हंसते हैं वो,

हमें अपना कह कर कभी बुलाते थे जो।

फिर भी उन्हें अपना मानकर हम तंज है सहते,

उनके थे नहीं कभी,

पर हम तो उनको अपना मान बैठे।

और वो ना हुए हमारे तो ना सही,

पर हम तो इक-तरफा इश्क कर बैठे।


कि ये इश्क था अगर गुनाह कोई,

तो ये गुनाह बेशक कर बैठे।

गर गुनाह है तो सजा भी लाजिम है,

हम तड़पते हैं उनकी याद में अब,

अब इसी की हकदार यह लकीरें मुलाजिम है।

और लकीर में जो था नहीं,

हम उसी के आस कर बैठे।

वो थे एक पत्थर कोई,

 हम पत्थर को खुदा मान बैठे।


कि हमें आस नहीं वह मिले आकर,

हम खुश हैं उनकी यादों को पाकर,

पर उस दो पल के याद को,

हम जहां भर का गम सह बैठे।

 जो थे नहीं वफा के काबिल,

हम उनसे उम्मीदे-वफा कर बैठे।


बदलता रहा जमाना,

बदलते रहे वो,

हम ना बदल सके,

किया था वादा जो।

और एक वादा-शिकन से किए वादे को,

हम ता उम्र का वादा मान बैठे।

वो ढालते रहे खुद को जमाने में,

हम जमाने से खुद को अलहदा कर बैठे।

इस अलहदगी की से बंजर जिंदगी,

और खुद को हभ बंजारा कर बैठे।


कि पता नहीं किस खोज में हूं,

पर सफर के मुंतज़िर बन बैठे।

 एक मंजिल है जो चाहिए नहीं,

और भटकने की आदत लगा बैठे।

 हम भटकते हैं अब शामो-सहर,

और भटकने को फर्ज बना बैठे।

 उजाड़ कर अपना आशिया हम,

उनसे नहीं उनके यादों से मोहब्बत कर बैठे।

जो थे नहीं काबिले तारीफ कभी,

उनको हम अपनी शायरी बना बैठे।

हम अब बर्बाद शायर कोई,

पर उनकी यादों को लफ्जों से सजाए बैठे।


कि वह मिलते नहीं,

हम बदलते नहीं।

दिन ढलता है,

नींद आती नहीं।

शायद नींद भी अब,

उनकी कर बैठे।

रात कट जाती है अब,

कलम-किताब और करवटों से मेरी।

यह बिस्तर भी कसती तंज जैसे,

उसको भी खबर है मजनूपन की मेरी,

और मेरे पागलपन का,

हम खुद ही शिकार बन बैठे।

हम लिखते-मिटाते रात भर उनको,

हम खुद को ना काबिले बर्दाश्त कर बैठे।

हम शायर थे इश्के-मोहब्बत के कभी,

अब शायर से पागल खुद को कर बैठे।

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