बेशक हुए दूर हम,
पर कसूर हमने कोई किया तो नहीं।
और ये रहमत है दर्द का,
दर्द अभी नासूर हुआ तो नहीं,
कि ये दूरियां है मजबूरी अब,
दोनों की सोची मंजूरी तो नहीं।
और कुछ लोग हैं इस ख्वाहिश में,
अलहदा हो जाए हम।
पर वो जालिम भी नासमझ है बड़ा,
यूं अलहदगी से इश्क कम होता तो नहीं।
बिछड़ना था लकीरों में बिछड़ गए हम,
मांगी हमने बिछड़ने की कोई दुआ तो नहीं।
पर जो बिछड़ कर ना अदा हो सके,
वो इश्क़ है दिल्लगी दिल की लगी तो नहीं।
यह इश्क हमारा मुसलसल रहेगा,
फासलों से हौसला कम होता तो नहीं।
और लाख कोशिशें कर ले कोई,
गर शिद्दत हो इश्क में,
तो इश्क़ रोके-रुकता नहीं।
इश्क़ रोके-रुकता नहीं।
हां यूं तो बिछड़ने का दर्द है हमें,
पर दर्द से दवा का खुब इल्म है हमें।
अब इस दर्द को समेट कर,
सिर्फ यादों में ही भेंट कर,
जिंदगी में बहुत खूब कर जाएंगे,
रो कर नहीं हंसते हुए वापस ज़रूर आएंगे।
पर अलहदगी से मिटा लूं खुद को,
मैं कोई रांझा मजनू तो नहीं।
और ताउम्र हम मुंतजिर रहे,
ये मोहब्बत है वक्त का मोहताज नहीं।
हां बदल जाए जो वक्त के साथ,
यें इश्क है धीरज का कोई जमाना तो नहीं।
हां यें इश्क है धीरज का,
बदल जाए जो कोई जमाना तो नहीं।
@Roy
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