Just4writing!
खामोशी से मना लेता हूं खुद को,जो रूठा तो मनाएगा कौन।मतलबी है जमाना यहां,बिना मतलब के अपना कहेगा कौन,और यूं तो है शोरे-बाजार का यहां,पर इस शोरे-बाजार में जो तू भी रूठी तो,सुनो "ख़्याल रखा करो अपना" ये कहेगा कौन,हमसे यह कहेगा कौन।
खामोशी से मना लेता हूं खुद को,
जो रूठा तो मनाएगा कौन।
मतलबी है जमाना यहां,
बिना मतलब के अपना कहेगा कौन,
और यूं तो है शोरे-बाजार का यहां,
पर इस शोरे-बाजार में जो तू भी रूठी तो,
सुनो "ख़्याल रखा करो अपना" ये कहेगा कौन,
हमसे यह कहेगा कौन।
@Roy
No comments:
Post a Comment