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इक उम्र कांट दिया मैंनेतन्हा जिसके इन्तज़ार में।ढुंढता रहा जिसको मैंहर बंजर से हर बाजार में।वो शख़्स मुददतो बाद मिलाआज अपने ही आशियाने में।कि खुद ही को ढुंढ लिया मैंनेआज इस मृगतृष्णा संसार में।
इक उम्र कांट दिया मैंने
तन्हा जिसके इन्तज़ार में।
ढुंढता रहा जिसको मैं
हर बंजर से हर बाजार में।
वो शख़्स मुददतो बाद मिला
आज अपने ही आशियाने में।
कि खुद ही को ढुंढ लिया मैंने
आज इस मृगतृष्णा संसार में।
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