Monday, 22 June 2020

मुसलसल इश्क़ (अंतहीन प्रेम)


कि हम हों अकेले या शरिक-ए-महफिल में,
चाहें हो गम या खुशियों के जजिरों में,
तूझे ना याद किया ऐसा कोई वक्त तो नहीं,
और हुआ क्या जो तू नहीं इन लकीरों में,
यह इश्क था, कोई सफर-ए-मंजिल तो नहीं,
हां इश्क़ हैं मेरा मुसलसल अब भी,
बदल जाए जो कोई मोहताज-ए-वक्त तो नहीं,

ना कर सके खुद को तेरे काबिल तो क्या,
यह मंजुरी थी ख़ुदा की, 
इस आदम ने मांगी कोई ख्वाहिश तो नहीं,
और यूं जो लोग हमें नाकाबिल समझते हैं,
उन्हें कहो जाकर यह फितूर दिल का हैं,
कोई जहन का सोचा साजिश तो नहीं।
हो ना सका बराबरी का तो क्या,
यह इश्क़ हैं को‌ई स‌ौदा तो नहीं।
और इश्क़ हैं मेरा मुसलसल अब भी,
बदल जाए जो कोई मोहताज-ए-वक्त तो नहीं,

कि हुआ क्या जो तूं ना मिला हमको,
हर चाही ख़ुशी मिले,
 यें मंजूर-ए-जिन्दगी तो नहीं,
 और कोशिशें तों रोज़ करता हूं पर,
 हो सके दों बातें तुझसे,
  इतना मैं काबिल तो नहीं,
  कैसे याद ना करूं उन लम्हों को,
  वो कुछ ख़ास लम्हे थे खुशियों कें,
  क्यों भुला दूं उन्हें कोई बुरा सपना तो नहीं,  
  हां इश्क़ हैं मेरा मुसलसल अब भी,
बदल जाए जो कोई मोहताज-ए-वक्त तो नहीं,

कि उम्मीदें हमने छोड़ दी तुझे वापस पाने की,
खबर हमें पहले से हैं दुर तेरें जाने की,
और तेरी बेवफ़ाई से तुझे बदनाम करूं,
इतना बेबस मेरां इश्क़ तो नहीं,
कि अब तेरी मुस्कान में खुशियां ढूंढता हूं,
बंद कर अपनें आंखों को,
तेरे दिए यादों को दोहराता हूं,
और भिगाकर तकिया, उसे पलटकर सोता हूं।
पर जाहिर करूं दुनिया को,
यह धीरज हैं कोई मज़ाक तो नहीं।
भुला दूं तुझे ज़िन्दगी से कैसे,
यह इश्क़ सबक था मेरा,
कोई गलती-ए-बचपना तों नहीं।
और इश्क़ हैं मेरा मुसलसल अब भी,
बदल जाए जो कोई मोहताज-ए-वक्त तो नहीं,

हां इकतरफा ही सही पर इश्क़ हैं मेरा,
तुझे रोज जो हिचकी आती हैं, वजह दिल हैं मेरा,
और सुनो यह इश्क़ हैं शिद्दत का,
बदल जाए रूख़ कोई दरिया तों नहीं,
कि हमें मालूम हैं तूं मेहताब हैं
दुर हैं हमसे क्योंकि तूं खांस हैं,
पर बदल जाना हैं फितरत तेरा,
और तेरे बदलने से बदल जाएं धीरज,
यह जरूरी तो नहीं,
हां इश्क़ हैं मेरा वे नज़ीर सा,
यह धीरज हैं कोई साहिल-ए-समंदर तो नहीं,
हां मेंरा इश्क़ हैं अब भी मुसलसल,
बदल जाए जो जमाने के तरह,
कोई मोहताज-ए-वक्त तो नहीं।

कि हमें मालूम हैं तूं मेहताब हैं
दुर हैं हमसे क्योंकि तूं खांस हैं,
पर बदल जाना हैं फितरत तेरा,
और तेरे बदलने से बदल जाएं धीरज,
यह जरूरी तो नहीं,
हां इश्क़ हैं मेरा वे नज़ीर सा,
यह धीरज हैं कोई साहिल-ए-समंदर तो नहीं,
और तेरे भुला देने से कैसे भुल जाऊं मैं तुझे,
कि मेरा इश्क़ हैं ख़ुदा सा,
और हम खुदगर्ज तो नहीं।
हां कर दें हमें भी दबा कोई,
पर यह इश्क़ हैं कोई मर्ज तो नहीं।
हां इश्क़ हैं मेरा मुसलसल अब भी,
बदल जाए जो कोई मोहताज-ए-वक्त तो नहीं।

                                          @Roy

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