अक्सर तन्हा रातों में,
मैं जब भी सोंचा करता हूँ,
मैं जब भी सोंचा करता हूँ,
क्यों तुझे ही सोंचा करता हूँ,
यू तो है करने को बहुत कुछ,
पर याद तुझे ही क्यों करता हूँ,
फिर करके याद उन बातों को,
क्यों लिपट अकेले रोता हूँ,
मैं जब भी रोया करता हूँ,
क्यों तुझे ही सोंचा करता हूँ,
मैं जब भी अपने पन्नो को,
पलट के पीछे करता हूँ,
सामने तो आ जाती हैं,
क्यों याद तुझे ही करता हूँ,
फिर तन्हा उन रातों में,
मैं फिर से सोचा करता हूँ,
जब सपना मेरा तोड़ना था,
ना अपना मुझे बोलना था, तो
क्यों दिखाया उन सपनों को,
जिनको याद मैं करता हूँ,
फिर करके याद उन सपनों को,
क्यों तन्हा अकेले रोता हूँ,
मैं जब भी रोया करता हूँ,
क्यों तुझे ही सोंचा करता हूँ,
कि बहुत किये थे कस्मे वादे,
जिनको तोड़ा है तूने,
जब तोड़ना था उन वादो को,
तो क्यों किया उन वादो को,
जिनको भुला हैं तूने,
शायद भुला दूँ कभी तुझे,
दुआ अब ये करता हूँ,
अब डर लगता है उन यादों से,
जिनको भुलाना चाहता हूं,
अब भूलना चाहता हूं जब तुझको,
तो एक बात बताना चाहता हूँ,
कि किया जो तूने साथ मेरे ना,
उसको तो दोहराया,
हज़ार मिलेंगे इस जहां में,
पर किसी एक को ही तू चुनना,
कही ना हो फिर ऐसा ,
ना मिले तुझे हम जैसा,
जो तेरी इक मुस्कान को मैं,
पागल तक कहलाता था,
हंसती रहे तू हमेशा,
इसलिए हसाया करता था,
अब बैठकर तन्हा इन रातों में,
मैं सोंचा अब यह करता हूँ,
क्यों रह गई बस यादें बनकर,
जिनको याद मैं करता हूँ,
फिर अक्सर तन्हा रातों में ,
मैं रोंकर सो जाता हूँ,
मैं रोंकर सो जाता हूँ।
@Roy
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