जो नजरें हमसे फेरने लगे हों,
कुछ तो बात है जो छुपाने लगे हों,
फिर भी यूं झुकी नज़रों से अपने,
बया अब सब करने लगे हों,
कि शायद अब ना हो रहा,
यूं फरेब का खेल तुमसे,
सादगी पे हमारी अब
तुम भी तरस खाने लगे हों,
कि तभी तो बताए कोई वजह बिना,
अपने इस दिवाने को,
अब दोस्त कहकर बुलाने लगे हों।
अब दोस्त कहकर बुलाने लगे हों।
@Roy
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कुछ तो बात है जो छुपाने लगे हों,
फिर भी यूं झुकी नज़रों से अपने,
बया अब सब करने लगे हों,
कि शायद अब ना हो रहा,
यूं फरेब का खेल तुमसे,
सादगी पे हमारी अब
तुम भी तरस खाने लगे हों,
कि तभी तो बताए कोई वजह बिना,
अपने इस दिवाने को,
अब दोस्त कहकर बुलाने लगे हों।
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