हमारी मोहब्बत का खुब इल्म है उन्हें,
रूठ जाए जो वो तो मना लेते हैं उन्हें,
और बेरूख़ी का आलम देखो तो ज़रा,
रूठे जो हम तो अब रुठना हैं उन्हें।
बेशक रूठों पर ये तो बताओ हमें,
जब इश्क़ है ये दोनों का,
तो क्या रूठने से दर्द सिर्फ होता हैं तुम्हें।
कोई जाएं जरा जाकर नसीहत दे उन्हें,
ये इश्क़ हैं गर शिद्दत तो रूठना आम हैं,
गर रूठे तो मनाना दुसरे का काम है,
अब कैसे हाल-ए-दिल बताएं उन्हें,
तन्हा ना सोया जाता है अब,
कैसे बयां गम-ए-तन्हाई करे उन्हें।
हमें तो लगा ये दिल्लगी हैं रूठना,
और रूठे जो पहली दफा हम तो,
अब अना का मसला ये लगा है उन्हें।
हम तो रूठे थे मान भी जाएंगे,
इश्क़ हैं हमारा तो झुक भी जाएंगे,
पर कैसे बेरूख़ी का ग़म बताएं उन्हें।
हमनें तो सोचा बस दो पल का हैं यें,
बेशक होंगी बातें वादा किया था हमनें,
पर दिल्लगी से रूठना रूठे जो हम,
अब दिल तोड़ने की सज़ा मिली हैं हमें।
हुईं जो हमसे गुनाह कोई,
तो कत्ल की सज़ा दो हमें,
हां बेशक हुईं हैं गलती हमसे,
पर तन्हाई की सज़ा तो ना दो हमें।
कि रात अब गुज़रती नहीं अलहदा,
बताओ कोई तरकीब कैसे मनाएं उन्हें।
क्या कभी ऐसे रूठे हैं वो,
कि मनाया नहीं गया हों उन्हें,
शायद रूठना हैं अब आदत उनकी,
या बोझ हैं हम और पीछा छुड़ाना हैं उन्हें,
तभी तो रूठे जो हम कभी,
तो बेबजह अब रुठना हैं उन्हें।
अब रुठना हैं उन्हें।
@Roy
Urdu
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Tuesday, 8 June 2021
रूठे जो हम तो अब रुठना हैं उन्हें
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