Thursday, 25 June 2020

इश्क़ जरा

कि रोकर मैं हर बात बोल दूं,
वो आकर हाल पुछे तो जरा।
अब थक चुका हूं मैं जिन्दगी से मेरे,
आखिरी दफा वो सुने तो जरा।
और ख़ामोश सा रहता हूं आजकल,
पर ख़ामोशी मेरी वो समझे तो जरा।

कि मेरा इश्क़ आज भी मुसलसल हैं ,
वो आकर कभी देखे तों जरा।
जिस रास्ते थे चले साथ कभी,
उन्हीं रास्तों में वापस आए तो जरा।

कि हों जाएं हम भी कुर्बान-ऐ-इश्क़,
कोई दास्तां-ऐ-इश्क़ सुने तो जरा।
हो चुके हैं इश्क़ में बर्बाद हम भी,
बस कहदे हमें कोई मीर तकी तो जरा।
और अब ग़ज़लो से उन्हें याद करते हैं हम,
बस कोई ग़ज़ल की गहराई समझे तो जरा।
कि ग़ज़लें हैं इबादत-ऐ-मोहब्बत अब,
कोई दुआ-ऐ-इश्क़ सुने तो जरा।

कि वो आए तो आख़िरी सांस लें जरा,
ना जीं सके सुकून की जिन्दगी तो क्या,
वो लाएं कभी खुशनुमा मौत तों जरा,
और इल्ज़ाम मेरे क़त्ल का ना देंगे उन्हें हम,
पर छोड़ा जो उन्होंने लाश हमें,
तो आकर कभी दफना भी दे जरा।
                                          @Roy

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