तुझ में छुपी सी जो शायरी है,
तुझको फिर सुनाऊं मैं जरा।
तेरी झील सी नीली आंखों में,
एक बार फिर डूब जाऊं मैं जरा।
सूख चुके मेरे घाव को
फिर से हरा कर दूं मैं जरा,
और मालूम है कि तू खुश है,
दफनाकर मेरे खुशियों को।
पर मुझे कुछ तो दे हक जरा,
कह सकूं मैं अपना तुझे,
एक बार फिर से मैं जरा,
एक बार फिर से मैं जरा।
@Roy
तुझको फिर सुनाऊं मैं जरा।
तेरी झील सी नीली आंखों में,
एक बार फिर डूब जाऊं मैं जरा।
सूख चुके मेरे घाव को
फिर से हरा कर दूं मैं जरा,
और मालूम है कि तू खुश है,
दफनाकर मेरे खुशियों को।
पर मुझे कुछ तो दे हक जरा,
कह सकूं मैं अपना तुझे,
एक बार फिर से मैं जरा,
एक बार फिर से मैं जरा।
@Roy

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